Monday, 6 April 2020

क्योंकि, मैं झील हूँ

क्योंकि, मैं झील हूँ।

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स्थायित्त्व ही मेरी प्रकृति है।

क्योंकि, मैं झील हूँ।

 

हौसला मेरा बुलंद है पहाडों की तरह

बुलंदीयों पर ही मेरा मुक़ाम है

बड़ी शिद्दत से प्रकृति ने मुझे रचा है

उसकी रचना का अंत होने दूँगी

क्योंकि, मैं झील हूँ।

मीठे पानी की गहरी झील।

 


 

यूं तो कई लोग मिलेंगे बर्फ़ की तरह

पल भर में जो पिघल जायेंगे

पिघलते उस पानी से पलकें भिगोऊँगी

उस खारे पानी मे मिठास मैं घोलूँगी

क्योंकि, मैं झील हूँ।

मीठे पानी की गहरी झील।

 

राह नदी की टेढ़ी है ज़िंदगी की तरह

रुकी धारा में आशियाना मेरा

मृत ज्वालामुखी में है बसेरा मेरा

खिसकती चट्टानों के गड्ढे में समाऊँ

क्योंकि, मैं झील हूँ।

मीठे पानी की गहरी झील।

 

स्थायित्त्व ही मेरी प्रकृति है।

क्योंकि, मैं झील हूँ।

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© धर्मेश गांधी

नवसारी - 6/Apr/20

https://youtu.be/ETTlVUFbijo

 

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