पर मैं अशांत नहीं
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मन में खलबली ज़रूर मची है
पर मैं अशांत नहीं।
ज़िंदगी को यूँ रस्सी से लटका दूं
इतना भी मैं अनुपशांत नहीं!
ना ऐसी दौलत है जो मेरे पीछे
मेरी परछाइयों को ज़िंदा रख सके,
ना ऐसी शोहरत है मेरी जहान में
जो बाद मेरे मरने के, सर उन्नत रख सके।
रास्ते रूक से ज़रूर गए हैं
पर मैं अशांत नहीं।
ज़िंदगी को यूँ मँझधार में फंसा दूं
इतना भी मैं अनुपशांत नहीं!
रोज़ अपनी शिकस्त से उलझता रहता हूँ
हरदम चीत्कार करती हैं मेरी नाकामीयाँ,
उन्हें फिर से ज़िंदा करने में जुटा हूँ
जो ख़्वाब कई दफ़ा टूट चुके हैं।
बियाबान से गुज़र ज़रूर रहा हूँ
पर मैं अशांत नहीं।
ज़िंदगी को यूँ मौत का तोहफा दे दूँ
इतना भी मैं अनुपशांत नहीं!
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© धर्मेश गाँधी
नवसारी 16.6.20
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अशांत = विचलित
खलबली = हलचल/घबराहट
शोहरत = यश/प्रसिद्धि
मँझधार = मध्य की धारा
शिकस्त = पराजय/असफलता
चीत्कार = चीख
बियाबान = वीराना
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# DGpoem #DGfiction


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